Rahat Indori Shayari in Hindi | Rahat Indori Shayri | राहत इंदौरी शायरी

1000+ Rahat Indori Shayari in Hindi | Rahat Indori Shayri | राहत इंदौरी शायरी

Rahat Indori Shayari in Hindi
Rahat Indori Shayari in Hindi

Rahat Indori Shayari in Hindi

आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो

ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो

राह के पत्थर से बढ़ कर कुछ नहीं हैं मंज़िलें

रास्ते आवाज़ देते हैं सफ़र जारी रखो

एक ही नद्दी के हैं ये दो किनारे दोस्तो

दोस्ताना ज़िंदगी से मौत से यारी रखो

आते जाते पल ये कहते हैं हमारे कान में

कूच का ऐलान होने को है तय्यारी रखो

ये ज़रूरी है कि आँखों का भरम क़ाएम रहे

नींद रखो या न रखो ख़्वाब मेयारी रखो

ये हवाएँ उड़ न जाएँ ले के काग़ज़ का बदन

दोस्तो मुझ पर कोई पत्थर ज़रा भारी रखो

ले तो आए शाइरी बाज़ार में राहत मियाँ

क्या ज़रूरी है कि लहजे को भी बाज़ारी रखो|


Rahat Indori Shayri
Rahat Indori Shayri

घर से ये सोच के निकला हूँ कि मर जाना है

घर से ये सोच के निकला हूँ कि मर जाना है

अब कोई राह दिखा दे कि किधर जाना है

जिस्म से साथ निभाने की मत उम्मीद रखो

इस मुसाफ़िर को तो रस्ते में ठहर जाना है

मौत लम्हे की सदा ज़िंदगी उम्रों की पुकार

मैं यही सोच के ज़िंदा हूँ कि मर जाना है

नश्शा ऐसा था कि मय-ख़ाने को दुनिया समझा

होश आया तो ख़याल आया कि घर जाना है

मिरे जज़्बे की बड़ी क़द्र है लोगों में मगर

मेरे जज़्बे को मिरे साथ ही मर जाना है

Read -> Happy Diwali Wishes in Hindi


Rahat Indori Shayari | राहत इंदौरी शायरी
राहत इंदौरी शायरी
Rahat Indori Shayari

अजनबी ख़्वाहिशें सीने में दबा भी

अजनबी ख़्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ,

ऐसे ज़िद्दी हैं परिंदे कि उड़ा भी न सकूँ,

फूँक डालूँगा किसी रोज़ मैं दिल की दुनिया,

ये तेरा ख़त तो नहीं है कि जला भी न सकूँ।


Rahat Indori Shayari in Hindi

रोज़ तारों को नुमाइश में

रोज़ तारों को नुमाइश में ख़लल पड़ता है,

चाँद पागल है अँधेरे में निकल पड़ता है,

रोज़ पत्थर की हिमायत में ग़ज़ल लिखते हैं,

रोज़ शीशों से कोई काम निकल पड़ता है।


राहत इंदौरी शायरी
राहत इंदौरी शायरी

बिखरी किताबें भीगे पलक

बिखरी किताबें भीगे पलक और ये तन्हाई,

कहूँ कैसे कि मिला मोहब्बत में कुछ भी नहीं।


ऐसा लगता है कि वो भूल गया है हमको,

ऐसा लगता है कि वो भूल गया है हमको,

अब कभी खिड़की का पर्दा नहीं बदला जाता।


देख कर मुझको निगाहें फेर क्यूँ लेते हो

देख कर मुझको निगाहें फेर क्यूँ लेते हो तुम,

क्या मेरे चेहरे पे अपना अक्स दिखता है तुम्हें।


देखी है बेरुखी की आज हम ने

देखी है बेरुखी की आज हम ने इन्तेहाँ,

हमपे नजर पड़ी तो वो महफ़िल से उठ गए।


हम जानते तो इश्क़ न

हम जानते तो इश्क़ न करते किसी के साथ,

ले जाते दिल को खाक में इस आरज़ू के साथ।


हमें अपने घर से चले हुए,

हमें अपने घर से चले हुए,

सरे राह उमर गुजर गई,

न कोई जुस्तजू का सिला मिला,

न सफर का हक ही अदा हुआ।


राहत इंदौरी शायरी 

कहीं किसी रोज़ यूँ भी होता,

कहीं किसी रोज़ यूँ भी होता,

हमारी हालत तुम्हारी होती,

जो रात हमने गुजारी तड़प कर,

वो रात तुमने गुजारी होती।


नसीब अपना असर हर हाल में

नसीब अपना असर हर हाल में

दिखला ही जाता है,

चलो कितना संभलकर

पाँव ठोकर खा ही जाता है।


हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते

हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते

जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते

अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है

उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते

अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के

जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते

रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना

हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते

मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था

तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते

मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद

लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते

हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे

कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते|


वो तो अपना दर्द रो-रो कर

वो तो अपना दर्द रो-रो कर सुनाते रहे,

हमारी तन्हाइयों से भी आँख चुराते रहे,

हमें ही मिल गया खिताब-ए-बेवफा क्योंकि,

हम हर दर्द मुस्कुरा कर छुपाते रहे।


राहत इंदौरी शायरी

खुद को औरों की तवज्जो का

खुद को औरों की तवज्जो का तमाशा न करो,

आइना देख लो अहबाब से पूछा न करो,

शेर अच्छे भी कहो सच भी कहो कम भी कहो,

दर्द की दौलत-ए-नायाब को रुसवा न करो।


बात मुक्कदर पे आकर

बात मुक्कदर पे आकर रूक गयी है वरना….

कोई कसर तो ना छोडी थी तुझे चाहने मे…


Rahat Indori Shayri

हमने सोचा के दो चार दिन की बात होगी

हमने सोचा के दो चार दिन की बात होगी लेकिन,

तेरे ग़म से तो उम्र भर का रिश्ता निकल आया…


मिलता ही नही तुम्हारे जैसा कोई

मिलता ही नही तुम्हारे जैसा कोई और इस शहर मै,

हमे क्या मालूम था कि तुम एक हो और वो भी किसी और के


उसने देखा ही नहीं अपनी हथेली

उसने देखा ही नहीं अपनी हथेली को कभी;

उसमे हलकी सी लकीर मेरी भी थी!


हर बार मुकद्दर को कुसुरवार कहना अच्छी बात नही..

हर बार मुकद्दर को कुसुरवार कहना अच्छी बात नही..

कभी कभी हम उन्हें भी मांग लेते है जो किसी और के होते है..


कुछ पेचीदा लफ्जों में मैंने

कुछ पेचीदा लफ्जों में मैंने अपनी बात रखी,

जमाना हँसता गया, जज्बात रोते गये…!


कुछ सपनों को पूरा करने निकले थे गाँव से,

किसको पता था कि गाँव जाना ही एक सपना बन जायेगा.


अभी मुठ्ठी नहीं खोली है मैंने

अभी मुठ्ठी नहीं खोली है मैंने आसमां सुन ले..

तेरा बस वक़्त आया है मेरा तो दौर आएगा…!!


इसे सामान-ए-सफ़र जान ये जुगनू रख ले

इसे सामान-ए-सफ़र जान ये जुगनू रख ले

राह में तीरगी होगी मिरे आँसू रख ले

तू जो चाहे तो तिरा झूट भी बिक सकता है

शर्त इतनी है कि सोने की तराज़ू रख ले

वो कोई जिस्म नहीं है कि उसे छू भी सकें

हाँ अगर नाम ही रखना है तो ख़ुश्बू रख ले

तुझ को अन-देखी बुलंदी में सफ़र करना है

एहतियातन मिरी हिम्मत मिरे बाज़ू रख ले

मिरी ख़्वाहिश है कि आँगन में न दीवार उठे

मिरे भाई मिरे हिस्से की ज़मीं तू रख ले


राहत इंदौरी शायरी

बात तो सिर्फ जज़्बातों की है

बात तो सिर्फ जज़्बातों की है वरना,

मोहब्बत तो सात फेरों के बाद भी नहीं होती…


बुलंदी तक पहुँचना चाहता हूँ

बुलंदी तक पहुँचना चाहता हूँ मै भी..!!

पर गलत राहों से होकर जाऊँ, इतनी जल्दी भी नही है


हम उस महफिल मे खामोश बेठते हे,

हम उस महफिल मे खामोश बेठते हे,

जहा …!

लोग अपनी हेसियत के गुण-गान गाते हे !


राहत इंदौरी शायरी 

सूरज ढला तो

सूरज ढला तो

कद से ऊँचे हो गए साये,

कभी पैरों से रौंदी थी,

यहीं परछाइयां हमने..


छोटे से दिल मे गम बहुत है,

जिन्दगी मे` मिले जख्म बहुत है,

मारी डालती कब कि ये दुनियाँ हमे

कम्बखत दोस्तो` की दुआ ओ मे दम बहुत है


ये रब अपने पास

ये रब अपने पास मेरी दुआ अमानत रखना

रहती दुनिया तक उसको सलामत रखना

मेरी आँखो के सारे दीप बुझा देना पर

उसकी आँखो के सारे ख्वाब पुरे करना


जीवन के रास्ते गुलज़ार रहें

जीवन के रास्ते गुलज़ार रहें

चेहरे पे सदा ही मुस्कान रहे

देता है दिल दुआ

ज़िन्दगी में हर दिन खुशियों की बहार रहे


Rahat Indori Shayri

तमन्ना करते हो जिन खुशियों की,

तमन्ना करते हो जिन खुशियों की,

दुआ है वह खुशिया आपके कदमो मे हो,

खुदा आपको वह सब हक़ीक़त मे दे,

जो कुछ आपके सपनो में हो.


जलील ना करो किसी गरीब

जलील ना करो किसी गरीब को।

वो भीख लेने नहीं हमे दुआ देने आते है।


सोने लगा हूँ तुझे ख्वाब

सोने लगा हूँ तुझे ख्वाब में देखने कि हसरत ले कर….

दुआ करना कोई जगा ना दे तेरे दीदार से पहले….!!


Rahat Indori Shayari in Hindi

जा के ये कह दे कोई शोलों से चिंगारी से

जा के ये कह दे कोई शोलों से चिंगारी से

फूल इस बार खिले हैं बड़ी तय्यारी से

अपनी हर साँस को नीलाम किया है मैं ने

लोग आसान हुए हैं बड़ी दुश्वारी से

ज़ेहन में जब भी तिरे ख़त की इबारत चमकी

एक ख़ुश्बू सी निकलने लगी अलमारी से

शाहज़ादे से मुलाक़ात तो ना-मुम्किन है

चलिए मिल आते हैं चल कर किसी दरबारी से

बादशाहों से भी फेंके हुए सिक्के न लिए

हम ने ख़ैरात भी माँगी है तो ख़ुद्दारी से|


आपकी बद्दुआ भी दुआ बनकर

आपकी बद्दुआ भी दुआ बनकर लगी

आपके हर ग़म ने भी सुकुन दिया

हम ज़िंदा है तो ये जानकर

प्यार से न सही आपने हमे याद तो किया


Rahat Indori Shayri

दुआ कौन सी थी हमे

दुआ कौन सी थी हमे याद नही बस इतना याद है..

दो हथेलियाँ जुड़ी थी एक तेरी थी एक मेरी थी..


सुनो क्या याद है तुमे

सुनो क्या याद है तुमे

वो मेरा हर दुआ मे तुमे मांगना


मैं फिर से निकला हूँ,

मैं फिर से निकला हूँ,

तलाशने को मेरी जिंदगी में खुशियाँ यारो..

दुआ करना इस बार किसी से मोहब्बत न हो


राहत इंदौरी शायरी

आसमाँ में मत ढूंढ़ अपने सपनों को,

सपनों के लिए तो जमीं जरुरी है,

सबकुछ मिल जाये तो दुनिया में क्या मजा,

जीने के लिए एक कमी भी जरुरी है।


खुशियाँ बटोरते बटोरते उम्र…

खुशियाँ बटोरते बटोरते उम्र गुजर गई

लेकिन खुश न हो सके…

एक दिन अहसास हुआ कि

खुश तो वे लोग हैं जो खुशियाँ बाँट रहे हैं।


इज्ज़त सम्मान ऐसी चीज़…

इज्ज़त, सम्मान एक ऐसी चीज़ है

जो जितना दोगे उससे ज्यादा पाओगे।


अफ़सोस करने से…

अफ़सोस करने से बढ़िया है,

कम से कम एक बार कोशिश जरूर करना।


बदलते लोग बदलते रिश्ते…

बदलते लोग, बदलते रिश्ते और बदलता मौसम,

चाहे दिखाई ना दे मगर महसूस जरूर होते है.


उसके तर्क-ए-मोहब्बत का सबब होगा कोई,

जी नहीं मानता कि वो बेवफ़ा पहले से था।


जब कभी फूलों ने ख़ुश्बू की तिजारत की है

जब कभी फूलों ने ख़ुश्बू की तिजारत की है

पत्ती पत्ती ने हवाओं से शिकायत की है

यूँ लगा जैसे कोई इत्र फ़ज़ा में घुल जाए

जब किसी बच्चे ने क़ुरआँ की तिलावत की है

जा-नमाज़ों की तरह नूर में उज्लाई सहर

रात भर जैसे फ़रिश्तों ने इबादत की है

सर उठाए थीं बहुत सुर्ख़ हवा में फिर भी

हम ने पलकों के चराग़ों की हिफ़ाज़त की है

मुझे तूफ़ान-ए-हवादिस से डराने वालो

हादसों ने तो मिरे हाथ पे बैअत की है

आज इक दाना-ए-गंदुम के भी हक़दार नहीं

हम ने सदियों इन्हीं खेतों पे हुकूमत की है

ये ज़रूरी था कि हम देखते क़िलओं के जलाल

उम्र भर हम ने मज़ारों की ज़ियारत की है


राहत इंदौरी शायरी

मेरे नाम से बदनाम…

मुझे तू अपना बना या न बना तेरी खुशी,

तू ज़माने में मेरे नाम से बदनाम तो है।


Rahat Indori Shayri

जाने क्यों बेवफा…

हर रात उसको इस तरह से भुलाता हूँ,

दर्द को सीने में दबा के सो जाता हूँ।

सर्द हवाएँ जब भी चलती हैं रात में,

हाथ सेंकने को अपना ही घर जलाता हूँ।

कसम दी थी उसने कभी न रोने की मुझे,

यही वजह है कि आज भी मुस्कुराता हूँ।

हर काम किया मैंने उसकी खुशी के लिए,

तब भी जाने क्यों बेवफा कहलाता हूँ।


Best Rahat Indori Shayari in Hindi

नाम बेवफा मत देना…

मुझे इश्क है बस तुमसे नाम बेवफा मत देना,

गैर जान कर मुझे इल्जाम बेवजह मत देना,

जो दिया है तुमने वो दर्द हम सह लेंगे मगर,

किसी और को अपने प्यार की सजा मत देना।


यूँ ही बेवफ़ा…

वो जमाने में यूँ ही बेवफ़ा मशहूर हो गये दोस्त,

हजारों चाहने वाले थे किस-किस से वफ़ा करते।


ऐ दोस्त व्हिस्की को कफ़न में बांध ला,

कब्र में बैठ कर पिया करेंगे,

इन लड़कियो से मिला है धोखा

चुड़ैलों से सेटिंग किया करेंगे।


मुस्कुराना तो हर लड़की की अदा है

जो इसे प्यार समझे वो सबसे बड़ा गधा है।


न्यूटन संग याद तुम्हारी …

अंधकार के घोर तिमिर में हॅसने के बाद रुलाती है,

तन्हाई और गम है साथ ये जिंदगी भी तड़पाती है,

मेरी हालत भी मुझसे जलती और रूठ जाती है,

जब आइंस्टीन और न्यूटन संग याद तुम्हारी आती है।


Rahat Indori Shayri

पहले हम लोटा थे…

एक बेवफा की याद में हम कुछ ख़ास हो गए,

पहले हम लोटा थे पर अब गिलास हो गए।


नखरे आपके तौबा-तौबा…

नखरे आपके तौबा-तौबा

गजब आपका स्टाईल है,

मैसेज तो आप कभी करते नहीं,

बस हल्ला मचा रखा है कि

हमारे पास भी मोबाईल है।


राहत इंदौरी शायरी 

रुखी रोटी को भी बाँट कर खाते हुये देखा मैंने,

सड़क किनारे वो भिखारी शहंशाह निकला।


जो मंसबों के पुजारी पहन के आते हैं

जो मंसबों के पुजारी पहन के आते हैं

कुलाह तौक़ से भारी पहन के आते हैं

अमीर-ए-शहर तिरी तरह क़ीमती पोशाक

मिरी गली में भिकारी पहन के आते हैं

यही अक़ीक़ थे शाहों के ताज की ज़ीनत

जो उँगलियों में मदारी पहन के आते हैं

हमारे जिस्म के दाग़ों पे तब्सिरा करने

क़मीसें लोग हमारी पहन के आते हैं

इबादतों का तहफ़्फ़ुज़ भी उन के ज़िम्मे है

जो मस्जिदों में सफ़ारी पहन के आते हैं


राहत इंदौरी शायरी

रोशनी कच्चे घरों तक…

वो जिसकी रोशनी कच्चे घरों तक भी पहुँचती है,

न वो सूरज निकलता है, न अपने दिन बदलते हैं।


वो राम की खिचड़ी…

वो राम की खिचड़ी भी खाता है,

रहीम की खीर भी खाता है,

वो भूखा है जनाब उसे,

कहाँ मजहब समझ आता है।


Rahat Indori Shayri

गरीबों की औकात ना पूछो…

गरीबों की औकात ना पूछो तो अच्छा है,

इनकी कोई जात ना पूछो तो अच्छा है,

चेहरे कई बेनकाब हो जायेंगे,

ऐसी कोई बात ना पूछो तो अच्छा है।

खिलौना समझ कर खेलते जो रिश्तों से,

उनके निजी जज्बात ना पूछो तो अच्छा है,

बाढ़ के पानी में बह गए छप्पर जिनके,

कैसे गुजारी रात ना पूछो तो अच्छा है।

भूख ने निचोड़ कर रख दिया है जिन्हें,

उनके तो हालात ना पूछो तो अच्छा है,

मज़बूरी में जिनकी लाज लगी दांव पर,

क्या लाई सौगात ना पूछो तो अच्छा है।

गरीबों की औकात ना पूछो तो अच्छा है,

इनकी कोई जात ना पूछो तो अच्छा है।


गरीबी में रिश्ता…

हजारों दोस्त बन जाते है, जब पैसा पास होता है,

टूट जाता है गरीबी में, जो रिश्ता ख़ास होता है।


काम सब ग़ैर-ज़रूरी हैं जो सब करते हैं

काम सब ग़ैर-ज़रूरी हैं जो सब करते हैं

और हम कुछ नहीं करते हैं ग़ज़ब करते हैं

आप की नज़रों में सूरज की है जितनी अज़्मत

हम चराग़ों का भी उतना ही अदब करते हैं

हम पे हाकिम का कोई हुक्म नहीं चलता है

हम क़लंदर हैं शहंशाह लक़ब करते हैं

देखिए जिस को उसे धुन है मसीहाई की

आज कल शहर के बीमार मतब करते हैं

ख़ुद को पत्थर सा बना रक्खा है कुछ लोगों ने

बोल सकते हैं मगर बात ही कब करते हैं

एक इक पल को किताबों की तरह पढ़ने लगे

उम्र भर जो न किया हम ने वो अब करते हैं


कहीं अकेले में मिल कर झिंझोड़ दूँगा उसे

कहीं अकेले में मिल कर झिंझोड़ दूँगा उसे

जहाँ जहाँ से वो टूटा है जोड़ दूँगा उसे

मुझे वो छोड़ गया ये कमाल है उस का

इरादा मैं ने किया था कि छोड़ दूँगा उसे

बदन चुरा के वो चलता है मुझ से शीशा-बदन

उसे ये डर है कि मैं तोड़ फोड़ दूँगा उसे

पसीने बाँटता फिरता है हर तरफ़ सूरज

कभी जो हाथ लगा तो निचोड़ दूँगा उसे

मज़ा चखा के ही माना हूँ मैं भी दुनिया को

समझ रही थी कि ऐसे ही छोड़ दूँगा उसे


Rahat Indori Shayri

मैं लाख कह दूँ कि आकाश हूँ ज़मीं हूँ मैं

मैं लाख कह दूँ कि आकाश हूँ ज़मीं हूँ मैं

मगर उसे तो ख़बर है कि कुछ नहीं हूँ मैं

अजीब लोग हैं मेरी तलाश में मुझ को

वहाँ पे ढूँड रहे हैं जहाँ नहीं हूँ मैं

मैं आईनों से तो मायूस लौट आया था

मगर किसी ने बताया बहुत हसीं हूँ मैं

वो ज़र्रे ज़र्रे में मौजूद है मगर मैं भी

कहीं कहीं हूँ कहाँ हूँ कहीं नहीं हूँ मैं

वो इक किताब जो मंसूब तेरे नाम से है

उसी किताब के अंदर कहीं कहीं हूँ मैं

सितारो आओ मिरी राह में बिखर जाओ

ये मेरा हुक्म है हालाँकि कुछ नहीं हूँ मैं

यहीं हुसैन भी गुज़रे यहीं यज़ीद भी था

हज़ार रंग में डूबी हुई ज़मीं हूँ मैं

ये बूढ़ी क़ब्रें तुम्हें कुछ नहीं बताएँगी

मुझे तलाश करो दोस्तो यहीं हूँ मैं


राहत इंदौरी शायरी

मस्जिदों के सहन तक जाना बहुत दुश्वार था

मस्जिदों के सहन तक जाना बहुत दुश्वार था

दैर से निकला तो मेरे रास्ते में दार था

देखते ही देखते शहरों की रौनक़ बन गया

कल यही चेहरा हमारे आइनों पर बार था

अपनी क़िस्मत में लिखी थी धूप की नाराज़गी

साया-ए-दीवार था लेकिन पस-ए-दीवार था

सब के दुख सुख उस के चेहरे पर लिखे पाए गए

आदमी क्या था हमारे शहर का अख़बार था

अब मोहल्ले भर के दरवाज़ों पे दस्तक है नसीब

इक ज़माना था कि जब मैं भी बहुत ख़ुद्दार था


Rahat Indori Shayari in Hindi

अजनबी ख़्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ –

अजनबी ख़्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ

ऐसे ज़िद्दी हैं परिंदे कि उड़ा भी न सकूँ

फूँक डालूँगा किसी रोज़ मैं दिल की दुनिया

ये तिरा ख़त तो नहीं है कि जिला भी न सकूँ

मिरी ग़ैरत भी कोई शय है कि महफ़िल में मुझे

उस ने इस तरह बुलाया है कि जा भी न सकूँ

फल तो सब मेरे दरख़्तों के पके हैं लेकिन

इतनी कमज़ोर हैं शाख़ें कि हिला भी न सकूँ

इक न इक रोज़ कहीं ढूँड ही लूँगा तुझ को

ठोकरें ज़हर नहीं हैं कि मैं खा भी न सकूँ


मेरे अश्कों ने कई आँखों में जल-थल कर दिया

मेरे अश्कों ने कई आँखों में जल-थल कर दिया

एक पागल ने बहुत लोगों को पागल कर दिया

अपनी पलकों पर सजा कर मेरे आँसू आप ने

रास्ते की धूल को आँखों का काजल कर दिया

मैं ने दिल दे कर उसे की थी वफ़ा की इब्तिदा

उस ने धोका दे के ये क़िस्सा मुकम्मल कर दिया

ये हवाएँ कब निगाहें फेर लें किस को ख़बर

शोहरतों का तख़्त जब टूटा तो पैदल कर दिया

देवताओं और ख़ुदाओं की लगाई आग ने

देखते ही देखते बस्ती को जंगल कर दिया

ज़ख़्म की सूरत नज़र आते हैं चेहरों के नुक़ूश

हम ने आईनों को तहज़ीबों का मक़्तल कर दिया

शहर में चर्चा है आख़िर ऐसी लड़की कौन है

जिस ने अच्छे-ख़ासे इक शायर को पागल कर दिया


मेरे कारोबार में सब ने बड़ी इमदाद की

मेरे कारोबार में सब ने बड़ी इमदाद की

दाद लोगों की गला अपना ग़ज़ल उस्ताद की

अपनी साँसें बेच कर मैं ने जिसे आबाद की

वो गली जन्नत तो अब भी है मगर शद्दाद की

उम्र भर चलते रहे आँखों पे पट्टी बाँध कर

ज़िंदगी को ढूँडने में ज़िंदगी बर्बाद की

दास्तानों के सभी किरदार कम होने लगे

आज काग़ज़ चुनती फिरती है परी बग़दाद की

इक सुलगता चीख़ता माहौल है और कुछ नहीं

बात करते हो यगाना किस अमीनाबाद की


Rahat Indori Shayri

मुझे डुबो के बहुत शर्मसार रहती है

मुझे डुबो के बहुत शर्मसार रहती है

वो एक मौज जो दरिया के पार रहती है

हमारे ताक़ भी बे-ज़ार हैं उजालों से

दिए की लौ भी हवा पर सवार रहती है

फिर उस के बाद वही बासी मंज़रों के जुलूस

बहार चंद ही लम्हे बहार रहती है

इसी से क़र्ज़ चुकाए हैं मैं ने सदियों के

ये ज़िंदगी जो हमेशा उधार रहती है

हमारी शहर के दानिशवरों से यारी है

इसी लिए तो क़बा तार तार रहती है

मुझे ख़रीदने वालो क़तार में आओ

वो चीज़ हूँ जो पस-ए-इश्तिहार रहती है


न हम-सफ़र न किसी हम-नशीं से निकलेगा

न हम-सफ़र न किसी हम-नशीं से निकलेगा

हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा

मैं जानता था कि ज़हरीला साँप बन बन कर

तिरा ख़ुलूस मिरी आस्तीं से निकलेगा

इसी गली में वो भूका फ़क़ीर रहता था

तलाश कीजे ख़ज़ाना यहीं से निकलेगा

बुज़ुर्ग कहते थे इक वक़्त आएगा जिस दिन

जहाँ पे डूबेगा सूरज वहीं से निकलेगा

गुज़िश्ता साल के ज़ख़्मो हरे-भरे रहना

जुलूस अब के बरस भी यहीं से निकलेगा


Rahat Indori Shayri

नदी ने धूप से क्या कह दिया रवानी में

नदी ने धूप से क्या कह दिया रवानी में

उजाले पाँव पटकने लगे हैं पानी में

ये कोई और ही किरदार है तुम्हारी तरह

तुम्हारा ज़िक्र नहीं है मिरी कहानी में

अब इतनी सारी शबों का हिसाब कौन रखे

बड़े सवाब कमाए गए जवानी में

चमकता रहता है सूरज-मुखी में कोई और

महक रहा है कोई और रात-रानी में

ये मौज मौज नई हलचलें सी कैसी हैं

ये किस ने पाँव उतारे उदास पानी में

मैं सोचता हूँ कोई और कारोबार करूँ

किताब कौन ख़रीदेगा इस गिरानी में


राहत इंदौरी शायरी

पुराने दाँव पर हर दिन नए आँसू लगाता है

पुराने दाँव पर हर दिन नए आँसू लगाता है

वो अब भी इक फटे रूमाल पर ख़ुश्बू लगाता है

उसे कह दो कि ये ऊँचाइयाँ मुश्किल से मिलती हैं

वो सूरज के सफ़र में मोम के बाज़ू लगाता है

मैं काली रात के तेज़ाब से सूरज बनाता हूँ

मिरी चादर में ये पैवंद इक जुगनू लगाता है

यहाँ लछमन की रेखा है न सीता है मगर फिर भी

बहुत फेरे हमारे घर के इक साधू लगाता है

नमाज़ें मुस्तक़िल पहचान बन जाती है चेहरों की

तिलक जिस तरह माथे पर कोई हिन्दू लगाता है

न जाने ये अनोखा फ़र्क़ इस में किस तरह आया

वो अब कॉलर में फूलों की जगह बिच्छू लगाता है

अँधेरे और उजाले में ये समझौता ज़रूरी है

निशाने हम लगाते हैं ठिकाने तू लगाता है


राहत इंदौरी शायरी 

रात की धड़कन जब तक जारी रहती है

रात की धड़कन जब तक जारी रहती है

सोते नहीं हम ज़िम्मेदारी रहती है

जब से तू ने हल्की हल्की बातें कीं

यार तबीअत भारी भारी रहती है

पाँव कमर तक धँस जाते हैं धरती में

हाथ पसारे जब ख़ुद्दारी रहती है

वो मंज़िल पर अक्सर देर से पहुँचे हैं

जिन लोगों के पास सवारी रहती है

छत से उस की धूप के नेज़े आते हैं

जब आँगन में छाँव हमारी रहती है

घर के बाहर ढूँढता रहता हूँ दुनिया

घर के अंदर दुनिया-दारी रहती है


रोज़ तारों को नुमाइश में ख़लल पड़ता है

रोज़ तारों को नुमाइश में ख़लल पड़ता है

चाँद पागल है अँधेरे में निकल पड़ता है

एक दीवाना मुसाफ़िर है मिरी आँखों में

वक़्त-बे-वक़्त ठहर जाता है चल पड़ता है

अपनी ताबीर के चक्कर में मिरा जागता ख़्वाब

रोज़ सूरज की तरह घर से निकल पड़ता है

रोज़ पत्थर की हिमायत में ग़ज़ल लिखते हैं

रोज़ शीशों से कोई काम निकल पड़ता है

उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो

धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है


Rahat Indori Shayri

सब को रुस्वा बारी बारी किया करो

सब को रुस्वा बारी बारी किया करो

हर मौसम में फ़तवे जारी किया करो

रातों का नींदों से रिश्ता टूट चुका

अपने घर की पहरे-दारी किया करो

क़तरा क़तरा शबनम गिन कर क्या होगा

दरियाओं की दावे-दारी किया करो

रोज़ क़सीदे लिक्खो गूँगे बहरों के

फ़ुर्सत हो तो ये बेगारी किया करो

शब भर आने वाले दिन के ख़्वाब बुनो

दिन भर फ़िक्र-ए-शब-बेदारी किया करो

चाँद ज़ियादा रौशन है तो रहने दो

जुगनू-भय्या जी मत भारी किया करो

जब जी चाहे मौत बिछा दो बस्ती में

लेकिन बातें प्यारी प्यारी किया करो

रात बदन-दरिया में रोज़ उतरती है

इस कश्ती में ख़ूब सवारी किया करो

रोज़ वही इक कोशिश ज़िंदा रहने की

मरने की भी कुछ तय्यारी किया करो

ख़्वाब लपेटे सोते रहना ठीक नहीं

फ़ुर्सत हो तो शब-बेदारी किया करो

काग़ज़ को सब सौंप दिया ये ठीक नहीं

शेर कभी ख़ुद पर भी तारी किया करो


Rahat Indori Shayri

सर पर सात आकाश ज़मीं पर सात समुंदर बिखरे हैं

सर पर सात आकाश ज़मीं पर सात समुंदर बिखरे हैं

आँखें छोटी पड़ जाती हैं इतने मंज़र बिखरे हैं

ज़िंदा रहना खेल नहीं है इस आबाद ख़राबे में

वो भी अक्सर टूट गया है हम भी अक्सर बिखरे हैं

उस बस्ती के लोगों से जब बातें कीं तो ये जाना

दुनिया भर को जोड़ने वाले अंदर अंदर बिखरे हैं

इन रातों से अपना रिश्ता जाने कैसा रिश्ता है

नींदें कमरों में जागी हैं ख़्वाब छतों पर बिखरे हैं

आँगन के मासूम शजर ने एक कहानी लिक्खी है

इतने फल शाख़ों पे नहीं थे जितने पत्थर बिखरे हैं

सारी धरती सारे मौसम एक ही जैसे लगते हैं

आँखों आँखों क़ैद हुए थे मंज़र मंज़र बिखरे हैं


राहत इंदौरी शायरी

अंदर का ज़हर चूम लिया धुल के आ गए

अंदर का ज़हर चूम लिया धुल के आ गए

कितने शरीफ़ लोग थे सब खुल के आ गए

सूरज से जंग जीतने निकले थे बेवक़ूफ़

सारे सिपाही मोम के थे घुल के आ गए

मस्जिद में दूर दूर कोई दूसरा न था

हम आज अपने आप से मिल-जुल के आ गए

नींदों से जंग होती रहेगी तमाम उम्र

आँखों में बंद ख़्वाब अगर खुल के आ गए

सूरज ने अपनी शक्ल भी देखी थी पहली बार

आईने को मज़े भी तक़ाबुल के आ गए

अनजाने साए फिरने लगे हैं इधर उधर

मौसम हमारे शहर में काबुल के आ गए


शहर क्या देखें कि हर मंज़र में जाले पड़ गए

शहर क्या देखें कि हर मंज़र में जाले पड़ गए

ऐसी गर्मी है कि पीले फूल काले पड़ गए

मैं अंधेरों से बचा लाया था अपने-आप को

मेरा दुख ये है मिरे पीछे उजाले पड़ गए

जिन ज़मीनों के क़बाले हैं मिरे पुरखों के नाम

उन ज़मीनों पर मिरे जीने के लाले पड़ गए

ताक़ में बैठा हुआ बूढ़ा कबूतर रो दिया

जिस में डेरा था उसी मस्जिद में ताले पड़ गए

कोई वारिस हो तो आए और आ कर देख ले

ज़िल्ल-ए-सुब्हानी की ऊँची छत में जाले पड़ गए


Rahat Indori Shayri

शजर हैं अब समर-आसार मेरे

शजर हैं अब समर-आसार मेरे

चले आते हैं दावेदार मेरे

मुहाजिर हैं न अब अंसार मेरे

मुख़ालिफ़ हैं बहुत इस बार मेरे

यहाँ इक बूँद का मुहताज हूँ मैं

समुंदर हैं समुंदर पार मेरे

अभी मुर्दों में रूहें फूँक डालें

अगर चाहें तो ये बीमार मेरे

हवाएँ ओढ़ कर सोया था दुश्मन

गए बेकार सारे वार मेरे

मैं आ कर दुश्मनों में बस गया हूँ

यहाँ हमदर्द हैं दो-चार मेरे

हँसी में टाल देना था मुझे भी

ख़ता क्यूँ हो गए सरकार मेरे

तसव्वुर में न जाने कौन आया

महक उट्ठे दर-ओ-दीवार मेरे

तुम्हारा नाम दुनिया जानती है

बहुत रुस्वा हैं अब अशआर मेरे

भँवर में रुक गई है नाव मेरी

किनारे रह गए इस पार मेरे

मैं ख़ुद अपनी हिफ़ाज़त कर रहा हूँ

अभी सोए हैं पहरे-दार मेरे


राहत इंदौरी शायरी

शाम ने जब पलकों पे आतिश-दान लिया

शाम ने जब पलकों पे आतिश-दान लिया

कुछ यादों ने चुटकी में लोबान लिया

दरवाज़ों ने अपनी आँखें नम कर लीं

दीवारों ने अपना सीना तान लिया

प्यास तो अपनी सात समुंदर जैसी थी

नाहक़ हम ने बारिश का एहसान लिया

मैं ने तलवों से बाँधी थी छाँव मगर

शायद मुझ को सूरज ने पहचान लिया

कितने सुख से धरती ओढ़ के सोए हैं

हम ने अपनी माँ का कहना मान लिया


राहत इंदौरी शायरी 

सिर्फ़ ख़ंजर ही नहीं आँखों में पानी चाहिए

सिर्फ़ ख़ंजर ही नहीं आँखों में पानी चाहिए

ऐ ख़ुदा दुश्मन भी मुझ को ख़ानदानी चाहिए

शहर की सारी अलिफ़-लैलाएँ बूढ़ी हो चुकीं

शाहज़ादे को कोई ताज़ा कहानी चाहिए

मैं ने ऐ सूरज तुझे पूजा नहीं समझा तो है

मेरे हिस्से में भी थोड़ी धूप आनी चाहिए

मेरी क़ीमत कौन दे सकता है इस बाज़ार में

तुम ज़ुलेख़ा हो तुम्हें क़ीमत लगानी चाहिए

ज़िंदगी है इक सफ़र और ज़िंदगी की राह में

ज़िंदगी भी आए तो ठोकर लगानी चाहिए

मैं ने अपनी ख़ुश्क आँखों से लहू छलका दिया

इक समुंदर कह रहा था मुझ को पानी चाहिए


सिर्फ़ सच और झूट की मीज़ान में रक्खे रहे

सिर्फ़ सच और झूट की मीज़ान में रक्खे रहे

हम बहादुर थे मगर मैदान में रक्खे रहे

जुगनुओं ने फिर अँधेरों से लड़ाई जीत ली

चाँद सूरज घर के रौशन-दान में रक्खे रहे

धीरे धीरे सारी किरनें ख़ुद-कुशी करने लगीं

हम सहीफ़ा थे मगर जुज़्दान में रक्खे रहे

बंद कमरे खोल कर सच्चाइयाँ रहने लगीं

ख़्वाब कच्ची धूप थे दालान में रक्खे रहे

सिर्फ़ इतना फ़ासला है ज़िंदगी से मौत का

शाख़ से तोड़े गए गुल-दान में रक्खे रहे

ज़िंदगी भर अपनी गूँगी धड़कनों के साथ साथ

हम भी घर के क़ीमती सामान में रक्खे रहे


Rahat Indori Shayri

तुम्हारे नाम पर मैं ने हर आफ़त सर पे रक्खी थी

तुम्हारे नाम पर मैं ने हर आफ़त सर पे रक्खी थी

नज़र शोलों पे रक्खी थी ज़बाँ पत्थर पे रक्खी थी

हमारे ख़्वाब तो शहरों की सड़कों पर भटकते थे

तुम्हारी याद थी जो रात भर बिस्तर पे रक्खी थी

मैं अपना अज़्म ले कर मंज़िलों की सम्त निकला था

मशक़्क़त हाथ पे रक्खी थी क़िस्मत घर पे रक्खी थी

इन्हीं साँसों के चक्कर ने हमें वो दिन दिखाए थे

हमारे पाँव की मिट्टी हमारे सर पे रक्खी थी

सहर तक तुम जो आ जाते तो मंज़र देख सकते थे

दिए पलकों पे रक्खे थे शिकन बिस्तर पे रक्खी थी


Rahat Indori Shayri

उसे अब के वफ़ाओं से गुज़र जाने की जल्दी थी

उसे अब के वफ़ाओं से गुज़र जाने की जल्दी थी

मगर इस बार मुझ को अपने घर जाने की जल्दी थी

इरादा था कि मैं कुछ देर तूफ़ाँ का मज़ा लेता

मगर बेचारे दरिया को उतर जाने की जल्दी थी

मैं अपनी मुट्ठियों में क़ैद कर लेता ज़मीनों को

मगर मेरे क़बीले को बिखर जाने की जल्दी थी

मैं आख़िर कौन सा मौसम तुम्हारे नाम कर देता

यहाँ हर एक मौसम को गुज़र जाने की जल्दी थी

वो शाख़ों से जुदा होते हुए पत्तों पे हँसते थे

बड़े ज़िंदा-नज़र थे जिन को मर जाने की जल्दी थी

मैं साबित किस तरह करता कि हर आईना झूटा है

कई कम-ज़र्फ़ चेहरों को उतर जाने की जल्दी थी


Rahat Indori Shayari in Hindi

उठी निगाह तो अपने ही रू-ब-रू हम थे

उठी निगाह तो अपने ही रू-ब-रू हम थे

ज़मीन आईना-ख़ाना थी चार-सू हम थे

दिनों के बाद अचानक तुम्हारा ध्यान आया

ख़ुदा का शुक्र कि उस वक़्त बा-वज़ू हम थे

वो आईना तो नहीं था पर आईने सा था

वो हम नहीं थे मगर यार हू-ब-हू हम थे

ज़मीं पे लड़ते हुए आसमाँ के नर्ग़े में

कभी कभी कोई दुश्मन कभू कभू हम थे

हमारा ज़िक्र भी अब जुर्म हो गया है वहाँ

दिनों की बात है महफ़िल की आबरू हम थे

ख़याल था कि ये पथराव रोक दें चल कर

जो होश आया तो देखा लहू लहू हम थे


ये ख़ाक-ज़ादे जो रहते हैं बे-ज़बान पड़े

ये ख़ाक-ज़ादे जो रहते हैं बे-ज़बान पड़े

इशारा कर दें तो सूरज ज़मीं पे आन पड़े

सुकूत-ए-ज़ीस्त को आमादा-ए-बग़ावत कर

लहू उछाल कि कुछ ज़िंदगी में जान पड़े

हमारे शहर की बीनाइयों पे रोते हैं

तमाम शहर के मंज़र लहू-लुहान पड़े

उठे हैं हाथ मिरे हुर्मत-ए-ज़मीं के लिए

मज़ा जब आए कि अब पाँव आसमान पड़े

किसी मकीन की आमद के इंतिज़ार में हैं

मिरे मोहल्ले में ख़ाली कई मकान पड़े


Rahat Indori Shayri

ये सर्द रातें भी बन कर अभी धुआँ उड़ जाएँ

ये सर्द रातें भी बन कर अभी धुआँ उड़ जाएँ

वो इक लिहाफ़ मैं ओढूँ तो सर्दियाँ उड़ जाएँ

ख़ुदा का शुक्र कि मेरा मकाँ सलामत है

हैं उतनी तेज़ हवाएँ कि बस्तियाँ उड़ जाएँ

ज़मीं से एक तअल्लुक़ ने बाँध रक्खा है

बदन में ख़ून नहीं हो तो हड्डियाँ उड़ जाएँ

बिखर बिखर सी गई है किताब साँसों की

ये काग़ज़ात ख़ुदा जाने कब कहाँ उड़ जाएँ

रहे ख़याल कि मज्ज़ूब-ए-इश्क़ हैं हम लोग

अगर ज़मीन से फूंकें तो आसमाँ उड़ जाएँ

हवाएँ बाज़ कहाँ आती हैं शरारत से

सरों पे हाथ न रक्खें तो पगड़ियाँ उड़ जाएँ

बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर

जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियाँ उड़ जाएँ


राहत इंदौरी शायरी

अंधेरे चारों तरफ़ साएँ साएँ करने लगे

अंधेरे चारों तरफ़ साएँ साएँ करने लगे

चराग़ हाथ उठा कर दुआएँ करने लगे

तरक़्क़ी कर गए बीमारियों के सौदागर

ये सब मरीज़ हैं जो अब दवाएँ करने लगे

लहू-लुहान पड़ा था ज़मीं पर इक सूरज

परिंदे अपने परों से हवाएँ करने लगे

ज़मीं पर आ गए आँखों से टूट कर आँसू

बुरी ख़बर है फ़रिश्ते ख़ताएँ करने लगे

झुलस रहे हैं यहाँ छाँव बाँटने वाले

वो धूप है कि शजर इल्तिजाएँ करने लगे

अजीब रंग था मज्लिस का ख़ूब महफ़िल थी

सफ़ेद पोश उठे काएँ काएँ करने लगे


राहत इंदौरी शायरी

यूँ सदा देते हुए तेरे ख़याल आते हैं

यूँ सदा देते हुए तेरे ख़याल आते हैं

जैसे काबे की खुली छत पे बिलाल आते हैं

रोज़ हम अश्कों से धो आते हैं दीवार-ए-हरम

पगड़ियाँ रोज़ फ़रिश्तों की उछाल आते हैं

हाथ अभी पीछे बंधे रहते हैं चुप रहते हैं

देखना ये है तुझे कितने कमाल आते हैं

चाँद सूरज मिरी चौखट पे कई सदियों से

रोज़ लिक्खे हुए चेहरे पे सवाल आते हैं

बे-हिसी मुर्दा-दिली रक़्स शराबें नग़्मे

बस इसी राह से क़ौमों पे ज़वाल आते हैं


ज़िंदगी को ज़ख़्म की लज़्ज़त से मत महरूम कर

ज़िंदगी को ज़ख़्म की लज़्ज़त से मत महरूम कर

रास्ते के पत्थरों से ख़ैरियत मालूम कर

टूट कर बिखरी हुई तलवार के टुकड़े समेट

और अपने हार जाने का सबब मालूम कर

जागती आँखों के ख़्वाबों को ग़ज़ल का नाम दे

रात भर की करवटों का ज़ाइक़ा मंजूम कर

शाम तक लौट आऊँगा हाथों का ख़ाली-पन लिए

आज फिर निकला हूँ मैं घर से हथेली चूम कर

मत सिखा लहजे को अपनी बर्छियों के पैंतरे

ज़िंदा रहना है तो लहजे को ज़रा मासूम कर


जो मेरा दोस्त भी है, मेरा हमनवा भी है

जो मेरा दोस्त भी है, मेरा हमनवा भी है

वो शख्स, सिर्फ भला ही नहीं, बुरा भी है

मैं पूजता हूँ जिसे, उससे बेनियाज़ भी हूँ

मेरी नज़र में वो पत्थर भी है खुदा भी है

सवाल नींद का होता तो कोई बात ना थी

हमारे सामने ख्वाबों का मसअला भी है

जवाब दे ना सका, और बन गया दुश्मन

सवाल था, के तेरे घर में आईना भी है

ज़रूर वो मेरे बारे में राय दे लेकिन

ये पूछ लेना कभी मुझसे वो मिला भी है


राहत इंदौरी शायरी 

बुलाती है मगर जाने का नईं

बुलाती है मगर जाने का नईं

ये दुनिया है इधर जाने का नईं

मेरे बेटे किसी से इश्क़ कर

मगर हद से गुजर जाने का नईं

सितारें नोच कर ले जाऊँगा

मैं खाली हाथ घर जाने का नईं

वबा फैली हुई है हर तरफ

अभी माहौल मर जाने का नईं

वो गर्दन नापता है नाप ले

मगर जालिम से डर जाने का नईं


मोम के पास कभी आग को लाकर देखूँ

मोम के पास कभी आग को लाकर देखूँ

सोचता हूँ के तुझे हाथ लगा कर देखूँ

कभी चुपके से चला आऊँ तेरी खिलवत में

और तुझे तेरी निगाहों से बचा कर देखूँ

मैने देखा है ज़माने को शराबें पी कर

दम निकल जाये अगर होश में आकर देखूँ

दिल का मंदिर बड़ा वीरान नज़र आता है

सोचता हूँ तेरी तस्वीर लगा कर देखूँ

तेरे बारे में सुना ये है के तू सूरज है

मैं ज़रा देर तेरे साये में आ कर देखूँ

याद आता है के पहले भी कई बार यूं ही

मैने सोचा था के मैं तुझको भुला कर देखूँ


ये हादसा तो किसी दिन गुज़रने वाला था

ये हादसा तो किसी दिन गुज़रने वाला था

मैं बच भी जाता तो इक रोज़ मरने वाला था

तेरे सलूक तेरी आगही की उम्र दराज़

मेरे अज़ीज़ मेरा ज़ख़्म भरने वाला था

बुलंदियों का नशा टूट कर बिखरने लगा

मेरा जहाज़ ज़मीन पर उतरने वाला था

मेरा नसीब मेरे हाथ काट गए वर्ना

मैं तेरी माँग में सिंदूर भरने वाला था

मेरे चिराग मेरी शब मेरी मुंडेरें हैं

मैं कब शरीर हवाओं से डरने वाला था


Rahat Indori Shayri

रोज़ तारों को नुमाइश में खलल पड़ता हैं

रोज़ तारों को नुमाइश में खलल पड़ता हैं

चाँद पागल हैं अंधेरे में निकल पड़ता हैं

मैं समंदर हूँ कुल्हाड़ी से नहीं कट सकता

कोई फव्वारा नही हूँ जो उबल पड़ता हैं

कल वहाँ चाँद उगा करते थे हर आहट पर

अपने रास्ते में जो वीरान महल पड़ता हैं

ना त-आरूफ़ ना त-अल्लुक हैं मगर दिल अक्सर

नाम सुनता हैं तुम्हारा तो उछल पड़ता हैं

उसकी याद आई हैं साँसों ज़रा धीरे चलो

धड़कनो से भी इबादत में खलल पड़ता हैं


Rahat Indori Shayri

वफ़ा को आज़माना चाहिए था

वफ़ा को आज़माना चाहिए था, हमारा दिल दुखाना चाहिए था

आना न आना मेरी मर्ज़ी है, तुमको तो बुलाना चाहिए था

हमारी ख्वाहिश एक घर की थी, उसे सारा ज़माना चाहिए था

मेरी आँखें कहाँ नाम हुई थीं, समुन्दर को बहाना चाहिए था

जहाँ पर पंहुचना मैं चाहता हूँ, वहां पे पंहुच जाना चाहिए था

हमारा ज़ख्म पुराना बहुत है, चरागर भी पुराना चाहिए था

मुझसे पहले वो किसी और की थी, मगर कुछ शायराना चाहिए था

चलो माना ये छोटी बात है, पर तुम्हें सब कुछ बताना चाहिए था

तेरा भी शहर में कोई नहीं था, मुझे भी एक ठिकाना चाहिए था

कि किस को किस तरह से भूलते हैं, तुम्हें मुझको सिखाना चाहिए था

ऐसा लगता है लहू में हमको, कलम को भी डुबाना चाहिए था

अब मेरे साथ रह के तंज़ ना कर, तुझे जाना था जाना चाहिए था

क्या बस मैंने ही की है बेवफाई,जो भी सच है बताना चाहिए था

मेरी बर्बादी पे वो चाहता है, मुझे भी मुस्कुराना चाहिए था

बस एक तू ही मेरे साथ में है, तुझे भी रूठ जाना चाहिए था

हमारे पास जो ये फन है मियां, हमें इस से कमाना चाहिए था

अब ये ताज किस काम का है, हमें सर को बचाना चाहिए था

उसी को याद रखा उम्र भर कि, जिसको भूल जाना चाहिए था

मुझसे बात भी करनी थी, उसको गले से भी लगाना चाहिए था

उसने प्यार से बुलाया था, हमें मर के भी आना चाहिए था


सर पर बोझ अँधियारों का है मौला खैर

सर पर बोझ अँधियारों का है मौला खैर

और सफ़र कोहसारों का है मौला खैर

दुशमन से तो टक्कर ली है सौ-सौ बार

सामना अबके यारों का है मौला खैर

इस दुनिया में तेरे बाद मेरे सर पर

साया रिश्तेदारों का है मौला खैर

दुनिया से बाहर भी निकलकर देख चुके

सब कुछ दुनियादारों का है मौला खैर

और क़यामत मेरे चराग़ों पर टूटी

झगड़ा चाँद-सितारों का है मौला खैर


Rahat Indori Shayri

सुला चुकी थी ये दुनिया थपक थपक के मुझे

सुला चुकी थी ये दुनिया थपक थपक के मुझे

जगा दिया तेरी पाज़ेब ने खनक के मुझे

कोई बताये के मैं इसका क्या इलाज करूँ

परेशां करता है ये दिल धड़क धड़क के मुझे

ताल्लुकात में कैसे दरार पड़ती है

दिखा दिया किसी कमज़र्फ ने छलक के मुझे

हमें खुद अपने सितारे तलाशने होंगे

ये एक जुगनू ने समझा दिया चमक के मुझे

बहुत सी नज़रें हमारी तरफ हैं महफ़िल में

इशारा कर दिया उसने ज़रा सरक के मुझे

मैं देर रात गए जब भी घर पहुँचता हूँ

वो देखती है बहुत छान के फटक के मुझे

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Pin It on Pinterest

Share This

Share Jokes

Share this post with your friends and Make them Laugh!